जल संरक्षण पर कार्यशाला: “पानी नहीं बचाया तो भविष्य अंधकारमय होगा” – अविनाश देव news today rbc palamu
जल संरक्षण पर कार्यशाला: “पानी नहीं बचाया तो भविष्य अंधकारमय होगा” – अविनाश देव
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डाल्टनगंज: “जल ही जीवन है” – यह कथन सदियों से मानव सभ्यता की नींव रहा है। परंतु आधुनिक युग में इंसान ने विकास की होड़ में प्रकृति का ऐसा दोहन किया है कि आज जल संकट जैसे गंभीर मुद्दे हमारे सामने हैं। इसी कड़ी में समग्र ग्राम विकास समिति द्वारा आज स्थानीय एचएम रिसॉर्ट में “जल संचय और संवर्धन: नदियों के पुनर्जीवन” पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य समुदाय की भागीदारी से नदी-नालों का संरक्षण सुनिश्चित करना था। इस अवसर पर पर्यावरणविदों और समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों ने पानी बचाने और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के उपायों पर चर्चा की।
अविनाश देव का संदेश: पानी बचाना समय की मांग
पर्यावरणविद अविनाश देव ने जल संकट की भयावहता पर प्रकाश डालते हुए कहा, “अगर हमने आज पानी बचाने के लिए कदम नहीं उठाए, तो 2050 तक पीने के पानी का गंभीर अभाव हो जाएगा। भारत में बोरवेल के माध्यम से सबसे ज्यादा भूजल निकाला गया है, लेकिन पानी को रोकने की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। जल को बचाने और पुनः उपयोग के लिए सामुदायिक प्रयासों की आवश्यकता है। नदी-नालों को सहेजकर सिंचाई के लिए पानी खेतों तक पहुंचाया जाए।”
उन्होंने जंगलों की कटाई और ग्लोबल वार्मिंग को जल संकट के मुख्य कारण बताया। “आजादी के बाद पलामू में 45% जंगल थे, जो अब केवल 9% रह गए हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई रोकने और अधिक से अधिक पौधारोपण करने से ही हम जल संकट पर काबू पा सकते हैं।”
कार्यशाला में प्रबुद्ध विचार और सुझाव
इस कार्यशाला में कई विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। सेवानिवृत्त प्रोफेसर डी.एस. श्रीवास्तव, विनोद प्रसाद, जेम्स हेरेंज, मिथिलेश जी, शिवशंकर प्रसाद, और मेघा श्रीराम ने जल संकट से निपटने के लिए अपने सुझाव दिए।
- जंगलों को कटने से रोकने के लिए सख्त कानून बनाने पर बल दिया गया।
- सिंचाई के लिए वर्षा जल संचयन और नदी पुनर्जीवन को प्राथमिकता देने की बात कही गई।
- सामुदायिक भागीदारी को जल संरक्षण में सबसे कारगर उपाय बताया गया।
भविष्य के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
कार्यशाला के दौरान एक संयुक्त घोषणा पत्र पर सहमति बनी, जिसमें जल संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने और सामुदायिक प्रयासों को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया।
कार्यशाला का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि “जल बचाने का कार्य सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। अगर आज हमने जल बचाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो भविष्य अंधकारमय होगा।”
जल संकट से बचने का रास्ता सामुदायिक सहभागिता और प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर ही संभव है।
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